गोह को विकसित करना प्राथमिकता : श्यामसुन्दर

बिहार विधानसभा चुनाव का पहला चरण समाप्त हो गया। 219-गोह विधानसभा क्षेत्र से जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) का मैं भी उम्मीदवार था। पार्टी नेता जाप सुप्रीमो माननीय पूर्व सांसद श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जी मुझसे आगाध प्यार करते रहे हैं। संघर्ष की ताकत मुझे पप्पू यादवजी से ही मिली है। गोह में लंबे समय से चल रहे सामंती जुर्म और नेता-अपराधी-अधिकारी गठजोर से लड़ने की ताकत सैद्धांतिक रूप से अगर मुझे बाबा साहेब डा.भीमराव अंबेडकर से मिली। सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय की हिफाजत के लिये सबकुछ न्योक्षावर करने की ताकत भी बाबा साहेब के सिद्धांत ने ही मुझे दिया है। जाप के युवा प्रत्याशी हैं श्यामसुंदर। गोह को विकसित करने के लिए ठाने हैं। वे ठगेरों से गोह को बचाना चाहते हैं। 
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तो बिहार लेनिन अमर शहीद जगदेव बाबू की शहादत मुझे ऊर्जा देते रहा। आज जब चारों ओर लूट-खसोट मची है, मुझे जन नायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी जीवन जीने का तरीका सीखा रहा है। 

मैं चुनावी समर में था। लगातार मेरा चुनावी दौरा चल रहा था। मैं मतदाताओं से अपना काम का दाम मांग रहा था। मेरे सवालों से हर कोई निरुतर था। पांच वर्षों तक गोह में बदलाव के लिये सोया नहीं। लगातार संघर्ष करते रहा। लोगों का भरपूर समर्थन और सहयोग मिलते रहा। हर जुर्म का प्रतिकार किया। बात चाहे बंदेया थाने को नक्सल की फैक्ट्री बना चुके सियासतदान को चुनौती देने की हो या फिर गोह मेला कांड में जातीय उन्माद फैला रहे सियासतदान पर लगाम लगाने की। हसपुरा में सोना खरीद रहे बीसीसीएल कर्मी बिंदा यादव को तड़पा-तड़पाकर हत्या किये जाने का मामला हो या फिर भारतीय सेना के जवान को तड़पा-तड़पाकर अधमरा किये जाने का। मृत व्यक्ति पर गोह थाना लुटने का मामला हो या फिर अल्पसंख्यक समाज से आने वाली गोह थानाक्षेत्र के दरधा गांव की अल्पसंख्यक बेटी को भिंड-मुरैना चंबल संभाग से मानव तस्करों से मुक्त कराने का मामला। जब सामंती सियासतदान के द्वारा निर्दोष नक्सल के नाम पर जेल भेजे जा रहे थे। पैक्स अध्यक्ष से लेकर जिला पार्षद तक को सामंती सियासतदान नक्सल के नाम पर जेल भेज रहा था। आश्चर्य तो यह कि गलत कागजात इकट्ठा कर जब गोह पोखरा पिंड कब्जा आलिशान मार्केट काम्प्लेक्स बनवा लिया। प्रशासनिक अधिकारी उसके इशारे पर नाचते रहे। मुझे भी सत्ताधारी सियासतदान 

नक्सल घोषित करवा दिया। मैंने 3 फरवरी को गोह चौक पर सरकार को चेताया-सच बोलना बगावत है, तो समझो हम भी बागी हैं। हमने सरकार से सवाल किया-सामाजिक न्याय की हिफाजत और जुल्मी का विरोध करना नक्सलियों का काम है तो मैं भी नक्सली हूं। मेरे जीते-जी आमलोगों पर कोई जुर्म नहीं सकता। मेरे इस ऐलान के बाद सामंती सियासतदान राजनीतिक और मुद्दा आधारित लड़ाई को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने में लगा रहा। पर्दे के पीछे से मेरे खिलाफ हर वह षड्यंत्र किया, जिसकी कल्पना सभ्य समाज नहीं कर सकता। फिर भी हमने जिंदगी की परवाह नहीं की। मरना तो एक ही दिन है और मैं मरने की लिये ठान लिया। हमने सोचा कि सत्य में ताकत नहीं होगी और मैं मारा भी जाऊं तो कोई गम नहीं। सत्य की हिफाजत के लिये मैं मरने की तैयारी कर चुका हूं।

 गोह की मासूमियत बचाने के लिये आग का गोला बना। प्रशासनिक अधिकारियों को हमने चेताना शुरू किया। पटना में बैठे आला अधिकारियों से मिलकर गोह के हालात से अवगत कराया। कानून की हिफाजत का हवाला दिया। आमलोगों को बचाने की गुहार लगाई। जहां कहीं भी मुझे लगा-आमलोगों के सवाल पर जूझते रहा। 

जब चुनावी समर में उतरा। मेरे सामने राजनीतिक धर्म संकट उत्पन्न हो गया। एक तरफ साम्प्रदायिक सामंती ताकतें थीं तो दूसरी ओर, सामंती सियासतदान की लंपटई, गुंडई। इन दोनों के बीच तीसरा विकल्प महागठबंधन का था और चौथा जाप प्रत्याशी के रूम में मैं खुद। चतुर्थकोणीय संघर्ष के आसार बन रहे थे। संघर्ष का सम्मान लोग कर रहे थे। जिले में अलग तरीके का संघर्ष मेरे नेतृत्व में गोह में चल रहा था। गोह विधानसभा क्षेत्र में सामाजिक न्याय की हिफाजत करने वाली जमात मेरे संघर्षों के साथ खड़ी थी। एक ओर जेल में कैद राजद सुप्रीमो श्री लालू यादव जी का व्यक्तित्व और दूसरी ओर मेरा संघर्ष। मेरी लकीर छोटी थी। मतदाता कहना शुरू कर दिये थे कि दोनों के टकराव में सामंती ताकतों की जीत होगी। एक बार फिर गोह हारेगा। यहां की मासूमियत हारेगी। बचाइये गोह को। मैं भी असमंजस में था। उधर महागठबंधन उम्मीदवार भी असहज महसूस कर रहे थे। भीम यादव जी के परिवार से मेरा पारिवारिक रिश्ता रहा है। मेरा बचपन बारूण में ही बीता है। सामाजिक न्याय की हिफाजत के लिये आम मतदाताओं की अपील पर मैंने फैसला किया-परिणाम चाहे जो हो, गोह का हालात बदतर है। सामने समाजवादी नेता स्व. अवध सिंह का चरित्र था। कामरेड रामशरण यादव का संघर्ष याद आया। लगातार 20 वर्षों से राजनीतिक वीरान गोह की धरती को नमन किया। मेरे राजनीतिक जीवन के टर्निंग प्वांइट के लिये अरवल विधायक रविंद्र सिंह का शुक्रगुजार हूं। माननीय नेता प्रतिपक्ष श्री तेजस्वी जी की उपस्थिति में भीम-श्याम की जोड़ी गले मिली। तालियों की गड़गड़ाहट से गोह का गांधी मैदान गुंजायमान हुआ। इतिहास करवट ले रहा था। ऐसी अद्भुत राजनीतिक घटना इतिहास में कम ही होता है। मुख्यमंत्री रहते तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल का मंत्रिमंडल समेत भाजपा में चले जाना। अचानक भाजपा से मोहभंग और राजद से नीतीश कुमारजी का मिलना। यूपी में सपा-बसपा का मिलना। कुछ इसी तरीके का सियासी घटनाक्रम का गवाह बना था 20 अक्टूबर को गोह का गांधी मैदान। मैदान खचाखच भरा। लाखों का हुजम। ना मुझे पता और ना ही महागठबंधन उम्मीदवार को। लेकिन अचानक से सबकुछ हो गया। तेजस्वी-भीम-श्याम की जोड़़ी़ हाथ उठा लोगों का अभिवादन किया तो एक साथ लाखों हाथ उठे। ये हाथ परिवर्तन के थे। मंच से ही सामंतियों के खात्मे का शंखनाद हुआ। हालांकि मेरे इस फैसले से कुछ लोगों को बेचैनी जरूर है। 

जानकारी के लिये बता दूं कि मार्च से लेकर अगस्त के पहले सप्ताह तक राजद का शीर्ष नेतृत्व की ओर से मुझे चार बार मिलने के लिये बुलावा आया। तब भी मिलने से इंकार करते रहा। तब मुझे गोह बचाने की चिंता थी। मैं विधानसभा चुनाव विजेता बनने के लिये लड़ना चाहता था। इस बात की शिरकत मैंने जिले के जाप नेताओं से की थी। जब हर लोग टिकट की दौड़ में पटना में डेरा डाले हुए थे। मैं अकेला आमलोगों के बीच आशीर्वाद यात्रा पर था। लोग मेरे संघर्ष के कायल जरूर थे, लेकिन असमंजस में थे। जायें तो जायें कहां? इस विकट स्थिति में गोह को बचाने के लिये मैं अपना बहुमूल्य योगदान सामंती जुर्म के खिलाफ संघर्ष के लिये दिया हूं। मैंने कुर्बानी दी है गोह को बचाने के लिये। मैंने शहादत दिया है सामाजिक न्याय की हिफाजत के लिये। मेरे इस फैसले का सम्मान आपके जेहन में कितना है-यह तो वक्त बताऐगा। मैंने अपनी समझ से कोई गुनाह नहीं किया है। सत्ता संरक्षित अपराधियों से गोह को बचाने के लिये मैंने जो कुर्बानी दी है,  इसमे अगर कोई कमी रह गई होगी,  तो आप सबों से माफी चाहता हूं। माफी चाहता हूं जाप सुप्रीमो पप्पू यादव जी से। याद कराना चाहता हूं जाप नेताओं को, जो यह कह रहे हैं कि आपने गलत किया। 

भाजपा-जदयू गठबंधन या फिर राजद-कांग्रेस-वाम गठबंधन। जब कभी गठबंधन की बात होगी तो क्या भाजपा से हाथ मिलाएगी जाप या फिर लालू यादव से! खाद्य बनने की तैयारी कर चुके पप्पू यादव जी-कई दफा कह चुके हैं कि लालू यादवजी मेरे आदर्श हैं? तो फिर मैंने गोह के हालात को देखते हुए यह कदम उठा लिया तो कौन सा गुनाह कर दिया?

राजद की बर्बादी पर सियासत नहीं होनी चाहिये। बल्कि यह सोचना होगा कि साम्प्रदायिक ताकतों को खत्म करने के लिये कौन सी रणनीति अपनानी चाहिये, जिसकी वजह से साम्प्रदायिक-सामंती ताकतों का खात्मा होगा और मैंने यही सोचकर यह कदम उठाया है। आने वाला वक्त बताऐगा कि मेरा फैसला सही है या गलत। गोह के बेहतर भविष्य की के  लिए तत्पर हैं।

➖AnjNewsMedia

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