2020 में किसकी सत्ता- सिंहासन
ना जानूँ इस बार बिहार की सिंहासन कौन हासिल करेगा, ज़ोर आज़माईश चल रही है। चुनावी तैयारी ज़ोरों पर जारी है। महा दिग्गज नेताओं में सीट शेयरिंग और सीटों के तालमेल को लेकर गहन चिंतन- मनन किया जा रहा है। चुनावी प्रशासनिक तैयारी भी युद्धस्तर पर प्रारंभ है। मतदाता जागरूकता का कार्यक्रम परवान पर है। सवाल वोट हासिल करने की है। क्योंकि वोट बहुमूल्य है। वोट से हीं सत्ता की खेल होती है। जिसमें महा राजनीति समाहित होती है। यूँ कहें, वोट प्राप्त करने की रणनीति होती है। जितनी वोट लेने की होड़ होती है, उतनी उत्थान की नहीं। यही वजह है जनता- जनार्द्धन अपने बहुमूल्य वोट को बहुत सोच- समझकर उम्मीदवार को देते हैं। जनता उम्मीदवार को पूरी तरह से जाँच परख कर वोट देती है।
लॉकडाउन के बदलते दौर में वोटर भी अपना बहुमूल्य वोट देने से पहले गहन विचार कर वोट के लिए बटन दबाएगा। क्योंकि मालिक मतदाता होता है, परंतु बदलते दौर में सेवक हीं अपने- आपको मालिक समझ बैठता है।
बस, यहीं से विपरीतनुमा उलट विचार दिग्गज नेताओं में समाहित होता है। जो जनता मालिक को चुनाव उपरांत रूलाता है।
बहुतो दिग्गज नेता सिद्धांत से भटक जाते हैं। वोट किसी के नाम पर लेते, सत्ता का अवसर देखते पाला बदल लेते। स्थापित महा दिग्गजों की ऐसी राजनैतिक हालात है। आप खुद से टटोलिए ! सत्ता के गलियारे में बैठे महा दिग्गज नेता सिद्धांत विहीन हैं। वे कुर्सी की लालच में क्षण भर में पाला बदल लेते हैं। दिखावटी हवा देते हैं कि मिट्टी में मिल जाएँगे परंतु … उससे नहीं मिलेंगे। हम सिद्धांतवादी हैं, परंतु वहीं सिद्धांत विहीनता का प्रमाण भी देता है। नेता कितने हद से गुज़र जाते हैं। सत्ता और कुर्सी इतनी प्यारी होती है। क्योंकि दुनिया का समस्त सुख वहाँ सहज प्राप्त होता है। राजनीति के बदलते दौर में सिद्धांत विहीन होना असली राजनीति हो गई है। इतना तो तय है कि इस परिवेश में सिद्धांत की राजनीति खत्म हो चुका है। उसका उदाहरण गवाह है, उदाहरण बताने की ज़रूरत नहीं है, दुनिया जानती है। अब राजनीति सिद्धांत विहीन हो चुकी है। मौक़ापरस्त राजनीति की दौर चल पड़ी है। क्योंकि दिग्गज नेताओं का सिद्धांत टूट कर बिखर चुका है, सिद्धांत खंडहर हो चुका है, नालंदा की खंडहर की तरह। दौर बदला है, लोग सिद्धांत रूपी खंडहर को भी राजनीति पर्यटन समझ उसके आकर्षण को निहारते, तब्बजो देते, अघाते नहीं। वाह री ! राजनीति, और राजनैतिक धुरंधरों, सिद्धांत को चुल्हा में झोंक कर विशुद्ध राजनीति करते हैं महा दिग्गजों। सच, महा दिग्गजों धन्य हैं, देखावटी राजनीति और चौपट सिद्धांत को लेकर फिर उतरेंगे, चुनावी मैदान में, खुद सिद्धांत विहीन हो, भोली- भावी जनता को सिद्धांत का हवाला देते अघाते नहीं। सिद्धांत विहीन, कुर्सीचिप्कू बाबू ! फिर आपके बीच डिजिटल चुनावी रैली के माध्यम से वोट हासिल करने का दाना- डालने आएँगे। सिद्धांत विहीन नेताओं से बचने का दौर है। रिटायरमेंट की उम्र में भी कुर्सी की लालच है। भला, ऐसी स्थिति रही तो युवाओं को कब राजनैतिक में स्थान मिलेगा। अब कुर्सीचिप्कू बाबू के आत्मबल में कमी साफ झलकती है। सत्ताचिप्कूबाबू के पहले वाला आत्मबल को सिद्धांत विहीनता ने तोड़ डाला है। 15 साल कुशासन , 15 साल सुशासन का ! निगेटिव, पॉज़ीटिव का दौर चला। 15- 15 का दौर, बँटता रहा ठौर, कीजिए ग़ौर। फिर भी विकसित नहीं हुआ बिहार। उत्थान से वंचित गाँव आज भी अपने भाग्य पर रोना रोती है। जितना विकास का ढोल्हा पिटाया, उतना धरातल पर नहीं झलकता। ना जानूँ ! विकास कब झलकेगा। बनता उम्मीद ! बिगड़ता उम्मीद ! बिखरता उम्मीद। उम्मीद पर खरे उतरना बड़ी बात है। शुरूआती वक़्त विकास का रहा, फिर गठबंधन- लठबंधन, सिद्धांत ख़ात्मा का। खुद मन में टटोल कर देखिए, कितना प्रतिशत सुशासन, कितना प्रतिशत कुशासन। अटकता, भटकता बिहार या चटकता बिहार। चुनावी बहार बिहार में है। चुनावी हवा चल पड़ी है। सरकार के किये कार्यों का आकलन में जुटी है जनता मालिक। चुनाव के बाद सेवक मालिक बन बैठता, जब चुनाव आया तो हाथ जोड़े वोट माँगने पहुँचने लगा। सत्ता पर मनमानी करता, और मालिक रूपी जनता को भूल जाता। जनाधार लेने के वक़्त हाथ जोड़ता जनमत के लिए, सत्ता बदलने के लिए जनता मालिक का विमर्श नहीं ली जाती, ऐसी कुटनीति। सबक़ सीखाने के लिए भी दिग्गज नेताओं की होड़ है। देखते जाना है, आख़िर बिहार में होता क्या है। जनता की चुनावी मूड किस ओर झुकता है। मुद्दे बहुत हैं परंतु वोटरों का इरादा क्या है। वोटर किसे पसंद करेगी, वक़्त ही बताएगा। 2020 में सत्ता किसकी होगी, समय के गर्भ में है। बस, सिर्फ आकलन, समीक्षा ! और उम्मीद हीं उम्मीद…
– अशोक कुमार अंज
अक्षरजीवी- कवि- पत्रकार
वजीरगंज, गया, इंडिया
