वनभूमि का हवाला देकर भदेजावासियों को उजाड़ रहे डीएफ़ओ
बने हुए पक्के मकान पर ग़ैर क़ानूनी तरीके से बुलडोज़र चलवाने से लोगों में भारी आक्रोश
गया : डीएफ़ओ अभिषेक कुमार ने गया जिले के मानपुर प्रखंड स्थित भदेजा में बसे कई लोगों के पक्के मकान को वगैर किसी सूचना के बुलडोज़र चलवा कर तोड़वा डाला। जिससे वहाँ बसे आमजनों में भारी आक्रोश है।
गया डीएफ़ओ के ग़ैर क़ानूनी कार्रवाई से तबाह भदेजावासी पीड़ित लोगों ने इस ग़ैर क़ानूनी तरीके से वगैर सूचना के ज़बरन मकान तोड़वाने वाले की घटना से तबाह हैं। पीड़ितों ने डीएफ़ओ के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराया है। क्योंकि डीएफ़ओ ने भदेजा में रहने वाले लोगों के पक्का मकान को बुलडोज़र से तोड़वाने की अमानवीय कार्रवाई की है। इस घटना से क्षुब्ध होकर पीड़ितों ने गया मुफ़स्सिल थाने में मामला दर्ज करवाया है।
ज्ञात हो बिहार प्रदेश के गया जिले के मानपुर प्रखंड अंतर्गत आता है मौजा भदेजा। इस मौजा भदेजा को वन अधिकारी डीएफ़ओ अभिषेक कुमार ने ग़ैर क़ानूनी तरीके से वगैर सूचना के एकाएक बुलडोज़र लेकर पहुँचे और वहाँ बने पक्का मकान पर बुलडोज़र चलवा को तोड़वा डाला। जिससे उनके खिलाफ आमजनों में भारी आक्रोश पादा हो गया है।
भदेजा मौजा वासियों ने बताया कि सरकार की ओर से ज़मीन को हरी झंडी मिली हुई है। जिस पर कोई सरकारी विवाद नहीं है। विवाद रहित होने के बाद भदेजा की ज़मीन पर मकान बना कर हम लोग वर्षों से रह रहे हैं।
जाहिर हो वन अधिकारी अभिषेक कुमार ने आज़ादी से पूर्व के वर्ष 1927 के हवाला देते हुए वन भूमि बता कर बने हुए मकान पर बुलडोज़र चलवा रहे हैं। जो ग़ैर क़ानूनी है। पीड़ितों ने कहा हमारे पास बिहार सरकार द्वारा ज़मीन की हरी झंडी मिली हुई है। जो क़ानूनी तौर पर बिल्कुल सही है।
ग़ौरतलब है कि भारत को ब्रिटिश हुकूमत से वर्ष 1947 में आज़ादी मिली, उसके उपरांत वर्ष 1950 में भारतीय संविधान बना।
डीएफ़ओ ने विवाद गढ़ कर भदेजावासी लोगों के निर्मित पक्के मकान को वन भूमि बता कर अचानक वगैर किसी सूचना के बुलडोज़र चलवा दिया। वहाँ निर्मित कई मकान को तोड़वा डाला। डीएफ़ओ के इस अमानवीय व्यवहार से लोगों में आक्रोश भड़क उठा है। क्योंकि सरकारी तौर पर वह जमींन उनकी रैती हो चुका है। ज़मीन ख़रीदी की गई है। जो गया निबंधन विभाग से निबंधित है।
मौजा भदेजा के ज़मीन को वन विभाग द्वारा वनभूमि की ज़मीन बता कर 145 एकड़ भूमि पर गया व्यवहार न्यायालय के सब जज- प्रथम के कोर्ट में क्रमश: हक़ीक़त मुकदमा नंबर 184/2016 तथा 185/2016 पूर्व में वन प्रमंडल पदाधिकारी नेशल मग्गी द्वारा दायर है। जिसमें सही से रयतों को पक्षधर भी नहीं बनाया गया है।
ज्ञात हो उक्त भूमि हाल सर्वे खतियान में बिहार सरकार के खाते में दर्ज है।
और वन अधिकारी ने बिहार सरकार को भी पार्टी नहीं बनाया। जबकि सत्यता यह है कि उक्त भूमि भूतपूर्व ज़मीनदार नकफोफा स्टेट का था। जो ज़मीन का नज़रीय हुकूमनामा से कई रयतों को प्रदान किया। और हाल के हुए सर्वे में गलत खतियान दर्ज के विरूद्ध रयतों ने दफ़ा 106 बीटी एक्ट के तहत सर्वे खतियान का सुधार कर रयतों के नाम ज़मीन का स्वामित्व दिया जा चुका है। जिसे बिहार सरकार ने भी स्वीकार किया है।
इतना हीं नहीं भूमि सुधार उपसमाहर्ता एवं मानपुर प्रखंड के अंचलाधिकारी द्वारा मालगुज़ारी रश्दि एवं डिमांड भी क़ायम है।
वन अधिकारी अभिषेक कुमार को काग़ज़ातों की कोई जानकारी नहीं है।
घटना पीड़ितों ने कहा कि गया में पदस्थापना के बाद ग़ैर क़ानूनी रूप से कार्रवाई कर कमाई की योजना के तहत डीएफ़ओ ने भदेजा में बने हुए आवासीय पक्के मकान पर बुलडोज़र चलवा कर तोड़वा दिया। जो पूरी तरह से ग़ैर क़ानूनी है।
जब वन अधिकारी ने अपने स्वामित्व की घोषणा के लिए न्यायालय से गुहार लगाए हैं। जो अभी गया न्यायालय में लंबित है। न्यायालय द्वारा कोई स्थगित आदेश भी निर्गत नहीं है। फिर किस हैसियत से क़ानून को अपने हाथ में लेकर भदेजावासियों के बने हुए पक्के मकान पर बुलडोज़र चलवा कर तोड़वा दिया। डीएफ़ओ की इस कार्रवाई से लोगों में भारी रोष व्याप्त है। क्योंकि उक्त कार्रवाई न्यायोचित नहीं है। यही वजह है कि भदेजावासी भू-स्वामियों ने वन अधिकारी डीएफ़ओ के ग़ैर क़ानूनी कार्रवाई के खिलाफ क्रिमिनल एक्ट के तहत गया न्यायालय में मामला दर्ज करवाया है।
घटना पीड़ित राजूकेशरी वे बताया कि रैती ज़मीन, जो शरीफ़ मियाँ, पिता मो. खैरूद्दीन से वर्ष 2012 में ख़रीदी। जो गया निबंधन कार्यालय में निबंधित है। उसमें कोई सरकारी अड़चन नहीं है। वर्ष 2013 से उस ज़मीन पर मकान बना कर रह रहे हैं। मकान बनाने तक कोई सरकारी व्यवधान नहीं आया। क्योंकि वह भूमि बिल्कुल सही है, उसमें कोई बाधा हीं नहीं है।
आगे श्री केशरी ने कहा कि उस ज़मीन का डिमांड नंबर है 97/10। वर्ष 2012-2013 तक सही तरीके से सरकारी लगान भी वसूल है। मामला बिल्कुल साफ है कि भदेजा की भूमि पर विवाद रहित है। परंतु वन अधिकारी डीएफ़ओ ने ज़बरन विवाद पैदा कर बने हुए आवासीय मकान को उजाड़ने पर तुले हुए हैं। जो बिल्कुल गलत है। डीएफ़ओ के पास कोई मजबूत काग़ज़ात भी उपलब्ध नहीं है। वे आज़ादी ते पूर्व के वर्ष 1927 का हवाला देते हुए ज़बरन भदेजा की भूमि को वनभूमि बता रहे हैं। जिससे सैकड़ो भू- स्वामी वन विभाग के पदाधिकारी के ग़ैर क़ानूनी रवैय्या से त्रस्त हैं।
इसी क्रम में श्री केशरी ने कहा भारत देश वर्ष 1947 में आज़ाद हुई। वर्ष 1950 में भारत का संविधान बना। इसके वाबजूद भी अंग्रेज़ी हुकूमत की सरकार की हवाला देकर तुग़लक़ी व्यवहार भू- स्वामियों के साथ कर रहे हैं डीएफ़ओ अभिषेक कुमार। जो पूरी तरह ग़ैर क़ानूनी है।
वनभूमि का हवाला देकर भदेजावासियों को उजाड़ रहे डीएफ़ओ। उनके बने हुए पक्के मकान को बुलडोज़र से करवाया गया ध्वस्त।
डीएफ़ओ के इस ग़ैर क़ानूनी कार्रवाई से भदेजा के भू- स्वामियों में व्याप्त है रोष।
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