आज़ादी का अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में रीजनल आउटरीच ब्यूरो ने आयोजित किया चर्चा
पटना: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के रीजनल आउटरीच ब्यूरो, पटना ने “भारत: एक राष्ट्र, आज़ादी, विभाजन और संपोषणीय विकास” विषय पर वेबीनार का आयोजन किया।
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| आज़ादी का अमृत महोत्सव पर PIB ने आयोजित किया वेबिनार |
वेबीनार की अध्यक्षता करते हुए प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो (पीआईबी) एवं रीजनल ऑफिस ब्यूरो (आरओबी), पटना के अपर महानिदेशक एस.के. मालवीय ने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इतिहास को नए तरीके से जानना-समझना और एक नए दृष्टिकोण से उसे आत्मसात करना, हमेशा रोमांचक होता है।
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उन्होंने कहा कि 13 अगस्त से 2 अक्टूबर तक आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। और इसी क्रम में वेबीनार जैसे आयोजनों के माध्यम से देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के डीन, प्रोफेसर एवं इतिहासकारों को सुनने का अवसर मिल रहा है। इस तरह के वेबीनार का उद्देश्य नई पीढ़ी को आजादी के महानायकों एवं इतिहास में उनकी भूमिका से अवगत कराना है।
वेबीनार में अतिथि वक्ता के रूप में शामिल सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ भुवन कुमार झा ने ‘देश का विभाजन और आजादी’ विषय पर विस्तारपूर्वक चर्चा करते हुए कहा कि भारत पूरी दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है जो इतने लंबे समय तक अपने लोकतंत्र को बनाए हुए हैं और लाख उतार-चढ़ाव के बावजूद वह अपने मूल्यों से डिगा नहीं है।
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उन्होंने कालक्रम के अनुसार विभाजन की परिस्थितियों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की। इतिहास की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मोहम्मद इकबाल शुरुआत से ही दो राष्ट्र सिद्धांत को लेकर जिन्ना को सुझाव दिया करते थे, लेकिन 1940 में वास्तविक रुप से मुस्लिम लीग के अधिवेशन में दो राष्ट्र के सिद्धांत को अपना लिया गया। उन्होंने कहा कि जिन्ना के मुस्लिम लीग को असली ताकत तब मिलती है, जब द्वितीय विश्व युद्ध के समय कांग्रेस ने ब्रिटिशराज को समर्थन देने से मना करते हुए अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया था।
’गांधी, खादी और संपोषणीय विकास’ विषय पर वेबिनार को अतिथि वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए दौलतराम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पूजा शर्मा ने कहा कि देश को सही दिशा में आगे ले जाने व विकसित करने के लिए हमें महात्मा गांधी और कुमारप्पा के सस्टेनेबल मॉडल का अनुकरण करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हम परमानेंट नहीं हैं, लेकिन यह नेचर परमानेंट है। लिहाजा, हमें खुद को आगे ना रखकर पर्यावरण को आगे रखते हुए विकास कार्य करने चाहिए। उन्होंने गांधीजी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत का जिक्र करते हुए कहा कि यह न केवल समाज के लिए बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है।
वेबीनार में शामिल हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ शंकर कुमार ने ‘भारत: इतिहास से उभरा एक राष्ट्र का विचार’ विषय पर अपने शोधपरक विचार व्यक्त किए।
उन्होंने प्रागैतिहासिक पाषाण युग से मानव सभ्यता के उदविकास की “संघर्ष व सहयोग” के सिद्धांत की चर्चा की और कहा कि भारत उन गिने-चुने राष्ट्रों में से एक है जहां सभ्यता का एक क्रमिक और अल्प-हिंसक इतिहास रहा है।
सोलह महाजनपद, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, चोल राजा, तुर्कों के आगमन, भारत में इस्लाम के अरबी-फारसी स्वरूप,अमीर खुसरो व अलबरूनी की रचनाओं, यूरोपीय उपनिवेशकों के प्रवेश जैसे ऐतिहासिक पड़ावों का हमारी संस्कृति व सभ्यता पर हुए असर से लेकर आज़ाद भारत तक की यात्रा की एक झलक भी उन्होंने प्रस्तुत की।
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उन्होंने कहा कि भारत में इस्लाम का एक शांत और सृजनात्मक रूप भी देखने को मिलता है, जिसने भारत के राष्ट्रीय स्वरूप के निर्माण में अहम भूमिका निभाई है।
वेबीनार में आरओबी के निदेशक विजय कुमार, पीआईबी के निदेशक दिनेश कुमार, सहायक निदेशक संजय कुमार, दूरदर्शन (समाचार) पटना की उपनिदेशक श्वेता सिंह, आरओबी एवं एफओबी के अधिकारी-कर्मचारी सहित अन्य लोग मौजूद थे।
वेबीनार का संचालन दूरदर्शन (समाचार), पटना के सहायक निदेशक सलमान हैदर ने किया।


