Sarabor Holi Hai

होली है तो खुशियां साथ होंगी। होली है तो रंग-गुलाल भी होगा। होली है तो खाना-पीना भी चलेगा। बिहार में जो बंद है, वो वाला पीना माइनस कर के समझें। हां जी! तो मैं कह रहा था। होली है तो दोस्त होंगे, मस्तियां होंगी। आनन्द ही आनन्द होगा।  लेकिन ऐसा तब होता है जब आपके ग्रह-नक्षत्र के हाथ-पैर सही-सलामत हों। वह सही-सही चल रहा हो। उसके मन-मिजाज दुरुस्त हों। साथ ही चाल-चरित्र भी ठीकठाक हों। ऐसा न रहा तो फिर भगवान के भरोसे भी न रहें, वह भी होली में बिजी रह सकते हैं और आपका तिया-पांचा कन्फर्म हो लेगा।

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यह उन दिनों की बात है जब मैं ताजा-ताजा ‘कॉलेज गोइंग गाय’ बना था। उसी दरम्यान मेरे साथ होली पर बहुत कुछ हुआ पर होली जैसा कुछ भी न हुआ। वो कहते हैं न कि अच्छे पल याद रहें न रहें बुरे पल जरूर याद रह जाते हैं। इसे आप अपनी सहूलियत से कह सकते हैं कि बुरे पल बार-बार याद आते हैं और ऊंगली कर के जख्म हरे कर जाते हैं। वही मेरे साथ हो गया। अब होली जब भी आने वाली होती है तो मुझ पर बीता पल फ्लैश बैक की तरह मेरे सामने होता है। सामने भी ऐसा कि 1.75 की चश्माधारी आंखों को बिना चश्मे के भी सब साफ-साफ दिखने लगता है। 

     अब बिना बाउंड्री मारे आप सबको फ्लैश बैक में लिए चलता हूं। पढ़ाई और परीक्षा के दौर में अपनी एक चचेरी बहन के घर पर टिका पड़ा था। मैं बहन का लाडला भाई था। सो सब कुछ घर जैसा ही था। अब स्टूडेंट था तो पढ़ाई भी करनी पड़ती थी। मन को समझाने भर पढ़ाई मैं किसी भी वक्त कर लिया करता था। लेकिन इसके बाद मेरे पास टाइम ही टाइम हुआ करता था। चूंकि टाइमपास करने के लिए कोई तो जरूरी होता है। इसलिए कई दोस्त बना रखे थे मैंने। बिहार बोर्ड की परीक्षाएं तब सुरसा के मुंह की भांति होती थीं। कितना खींचेंगी, बोर्ड भी नहीं जानता था। सेशन की तो ऐसी की तैसी रहती ही थी। तीन-चार साल में दो साल का पाठ्यक्रम पूरा कर-करा कर बोर्ड और परीक्षार्थी चांद फतह कर लेने का सुख पाते थे। रिजल्ट का प्रतिशत कुछ भी रहा हो, खुशी शत-प्रतिशत ही मिलती थी। बोर्ड के अध्यक्ष-सचिव अपनी और परीक्षार्थी अपनी मूंछों पर ताव देते हुए सेशन का इति श्री रेवाखंडे इस तरह से मान लिया करते थे जैसे महाजन के पुराने कर्जे से उऋण हो लिए। अब इस हाल में परीक्षार्थी की क्या औकात कि वह अपना आगत और परीक्षा का भविष्य जान सके। यही कारण था कि सभी परीक्षार्थी गीता ज्ञान को गांठ बांध कर बस श्रीकृष्ण के कहे अनुसार वर्तमान को ही प्रारब्ध मान कर चलते थे। मैं भी परीक्षार्थी था। इसलिए गीता ज्ञान के साथ ही बोर्ड की शरण में अटका पड़ा था। 

       इसी बीच, बहन और सभी परिजनों को गांव जाना पड़ा। एक शादी थी। शादी में मेरा जाना भी जरूरी था। लेकिन बाद में रोजगार की गैरफलप्रद भागदौड़ में अन्य बेरोजगारों के साथ अपना नाम शुमार करा कर माता-पिता का नाम रौशन करने के लिए मेरा परीक्षा देना ज्यादा जरूरी माना गया। और मैं काबिल बेटों के बाप की तरह अपने हाल पर कमरे में अकेला छोड़ दिया गया। कुछ जरूरी हिदायत दी गयी। कहा गया, ‘जरूरी सामान किराना वाले से खरीदा जा सकता है। उसे कह दिया गया है।’ अब रह गयी बात खाने-पीने के जुगाड़ की। अपनी सहूलियत, सलाहियत और पाक कला की कच्ची-पक्की महारत के बूते अपने हाथ जगन्नाथ बन कर सब मुझे ही करना था। इस हाथ ने ऑमलेट के अलावा तब तक कुछ बनाना सीखा नहीं था। इसलिए फ्राइंग पैन और कड़छी के अलावा किसी अन्य किचनीय अस्त्र-शस्त्र  का रत्ती भर भी बोध मुझे नहीं था। इसके बावजूद ट्रेनी अभिमन्यु बना कर किचेन के अल्पकालिक चक्रव्यूह में धकेल-धकाल कर मुझे भेज दिया गया था। एक-दो दिन रो-कलप कर किचन में हाथ आजमाए। आजमाए क्या, जलाए। और फिर मन ही मन यह ले अपनी लकुटी कमरिया कह कर किचन का त्याग किया और अपन एक सस्ते से होटल को शरणागत हो गए। 

         इधर, मिस्टर बसंत ने दस्तक दे डाली थी। प्रियतम की पुकार सुनकर प्रेयसी होली दौड़ी-भागी चली आ रही थी। उसका रूतबा ऐसा कि उत्साही युवा और बच्चे टाइम से पहले ही रंगों और फुग्गों से उसका वेलकम कर पड़े थे। कुल मिला कर होली का टाइम अच्छा चल रहा था और मेरा टाइम खराब। तो वह न भूलने वाली नामुराद होली आ ही गयी। होली की पूर्व संध्या पर सभी दोस्तों ने बारी-बारी से कहा, ‘कल का खाना मेरे साथ मेरे घर पर होगा। साथ में होली खेलेंगे। नदी में जा कर स्नान करेंगे। और फिर साथ-साथ चिकेन-मटन का आनंद लेंगे।’ होली के दिन होटलों को यूं भी बंद रहना था। इसलिए यह विकल्प मुझे पसंद आ गया। न्यौता स्वीकार कर आश्वस्त भाव से कमरे में लौट आया। रात में खोपड़ी ने अलर्ट किया, ‘बेटा, कहां फेर में पड़ रहे हो। दोस्तों की चंडाल चौकड़ी ऐसी गत बनाएगी कि अगले एक सप्ताह तक लंगूर बने फिरोगे। कपड़ों की तो खैर मरसिया ही पढ़ लेना। शायद इनमें फिर प्राणवायु लौट कर आएं भी नहीं।’ अब भाई साहब! गिनती के कपड़े अपने पास थे। पूरा घर तो अपने साथ था नहीं। इन कपड़ों के भरोसे ही परीक्षा तक दिन काटने थे। खूब ठोक-पीट कर सोचा और फैसला किया कि होली खेलने बाहर नहीं निकलना है। समस्या यह थी कि दोस्तों की टोली कमरे तक आ धमकी तो? झट से चाचा चौधरी से भी तेज दिमाग चला कर मैंने इसका काट निकाल लिया। चाचा चौधरी के बहुत सारे कॉमिक्स मैंने पढ़ रखे थे। मन ही मन चाचा चौधरी के सर्जक प्राण जी का मैंने शुक्रिया अदा किया। आखिरकार उनका दिया ज्ञान ऐन वक्त पर मेरे काम आ गया था। मैंने प्लान किया कि खूब सवेरे पिछले दरवाजे से निकल कमरे के बाहरी दरवाजे पर ताला लगा देना है और फिर आराम से अंदर पड़े रहना है। अपनी जीनियस टाइप बुद्धि को दाद देते हुए इसे ही सबसे सटीक उपाय मान कर अपनी पीठ थपथपाया और लम्बी तान कर सो गया। सब प्रीप्लान्ड था। चुनांचे इसी पर ससमय सफलतापूर्वक अमल कर डाला। 

      होली की हुड़दंग की बाहर उठती आवाज सिहरा रही थी। पर अपन मगन थे। मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। खुद को इस आफत से बचा ले जाने पर बार-बार अपना ही मुंह चूमने का मन कर रहा था। चूंकि इस अत्यंत जटिल प्रक्रिया को संपादित कर पाना मेरी औकात से बाहर थी इसलिए आभासी खुशी के साथ ही समय काटता रहा। संकट तब हुई जब घड़ी के साथ-साथ पेट के भी बारह बजे। किसी दोस्त ने अब तक खाना खाने के लिए बुलाने की जहमत नहीं उठायी थी। इंतजार में एक घंटा और बीता। बिना काल, प्रसंग और आवश्यकता के अपने और आसपास वालों के मान-सम्मान से शाश्वत भाव से परे रह कर खूब चीखने-चिल्लाने वाले दोस्तों की चूं-चपड़ तक के लिए उस वक्त कान तरस कर रह गए थे मेरे। पेट के साथ-साथ मेरी हालत खराब। भूख के कारण कष्ट झेल रहे शरीर का समय खराब चल रहा था लेकिन दीवार घड़ी सही चल रही थी। घड़ी ने दो बजा ही डाले। मरी सी आंखें लिए घड़ी की वफादारी के साथ ही अपने दोस्तों की बेवफाई के बारे में सोचने की कोशिश की। लेकिन तब तक कुछ भी सोचने-समझने की शक्ति क्षीण पड़ चुकी थी। मरता क्या न करता वाली स्थिति में और कुछ कर नहीं सकता था इसलिए फिर से सोचने ही बैठ गया, ‘इस हालात में क्या करूं? इस झंझट से कैसे बाहर निकलूं?’ अचानक खोपड़ी की अलार्म ने याद दिलाने के अपने फर्ज को अदा किया,  ‘बेटा, इत्ती जल्दी भूल गए। बाहर से ताला मार कर अंदर बैठे हो। ले देख, यह ताला आज तेरी कुंडली पर ही पड़ गया।’ इस हाल में दिमाग सुन्न पड़ने के मूड में आने वाला था। लेकिन उस विपरीत परिस्थितियों में भी उसने चलने की कोशिश की। यह अलग बात है कि मेरी नादानी से नाराज हो कर उसने मुझे ही लताड़ डाला, ‘पड़ गयी न तेरी उस्तादी तुझ पर ही भारी। और कर ले चालाकी।’ अब टकाटक सारी बातें खुद-ब-खुद समझ में आती चली गयीं। यही कि दोस्त आए जरूर होंगे। दूर से ताला पड़ा देखा होगा और बैरंग लौट गए होंगे। भूल की अहसास ने शर्मिंदा किया लेकिन भूख की अहसास ने भारी पड़कर अगला कदम उठाने का हौसला भी दिया। चूंकि दोपहर बाद धुलेन्डी यानि कीचड़ और बंदरिया अर्थात बदरंगिया रंगों वाली होली के आतंक का अंतकाल होता है इसलिए पिछले दरवाजे से घिसटते कदमों से बाहर निकल कर मैंने अकल और दरवाजे पर पड़े ताले को खोलकर हटा दिया। और फिर अंदर कमरे में किसी भी दोस्त के नमुदार होने की प्रतीक्षा में बैठा रहा। शुभ-शुभ की कामना करता रहा। 

       अचानक ऐसा लगा, ऊपर वाले ने मेरी सुन ली है। तब ही तो बाहर दोस्तों की आवाज सुनाई पड़ने लगी थी मुझे। मेरे कदम भारी-भारी थे परन्तु  बुझते दीए की तेज लपलपाती लौ की तरह मेरे उत्साह ने जोर मारा और दस्तक से पहले ही मैंने दरवाजा खोल डाला। सामने दोस्तों की टोली ही थी। लेकिन उन पर चंडाल चौकड़ी वाला भूत अब भी सवार था। उन्होंने टाइम बाउंडेशन का कतई लिहाज नहीं रखा था और धुलेन्डी के बाद तक भी सभी खुद भूत बने खड़े थे। मैं इन प्रेतात्माओं से बचने के लिए कुछ सोचने की सोच ही रहा था कि सभी मुझ पर ऐसे टूट पड़े जैसे महागठबंधन के सीएम कामनाधारी दर्जनभर नेताओं को एक निखालिस कुर्सी हाथ लग गयी हो। चूंकि मेरे जैसा साफ-सुथरा आदमजात उस वक्त तक शहर भर में संभवत: मैं ही अकेला बचा था इसलिए सभी ने उदारतापूर्वक मेरा सदुपयोग कर लिया। अगले एक मिनट के अंदर सुबह से बचा कर रखे गये मेरे द्वारा माना जाने वाला मेरा ‘सलोना’ मुखड़ा और कपड़ों की गत निचुड़ कर मिश्रित रूप से मिश्र की पिरामिड से निकले किसी ममी से मिलते-जुलते हो गए थे। थोड़ा तजवीजने पर किसी एंगल से बंदर तो किसी एंगल से चिम्पैंजी से मेल खाता मैं नजर आने लगा था। चूंकि चंडाल चौकड़ी के बैरियरतोड़ प्रवेश के बाद मेरा कमरा ही धमाचौकड़ी स्थल में तब्दील हो चुका था इसलिए हैंगर पर टंगे कपड़े और बेडशीट आदि भी होलियाना की हद पार करते हुए मेरे जैसे कीचड़युक्त रंग में बुरी तरह से रंग चुके थे। मैं बौखलाहट में चीखता-चिल्लाता रहा लेकिन दर्जनों की भीड़ में एक भूखे इंसान की आवाज हंगामेदार सदन के स्पीकर की आवाज की तरह से फुस्स हो कर रह जा रहे थे। 

       रंगों और मुस्टंडों की सुनामी थमी। मैं कुछ बोलता इससे पहले उन्हीं दोस्तों ने शिकायत धर दी। ‘अबे, दिनभर ताला मारकर किसके घर पड़ा था?’ मैं क्या कहता। हाल-ए-बयां धर कर अपनी भद्द पिटवाने की जगह मैंने उन सभी पर हमलावर हो कर अपनी बची-खुची इज्जत बचाने की कोशिश की, ‘पहले यह बता, अब तक किसी ने खाने पर क्यों नहीं बुलाया? मेरी हालत खराब हो रही है भूख के मारे।’ एक के बाद एक सभी का एक समान जवाब आता गया, ‘मैं तो आया था। बाहर ताला लगा देखा तो सोचा किसी दोस्त के घर गया होगा। फिर मैंने सोचा, शाम का खाना मेरी तरफ रहेगा।’ लो भाई, इस मोर्चे पर भी मुझे जीरो बटा जीरो ही मिले थे। मुरझाए मन से कहना पड़ा, ‘अब क्या करें?’ दोस्तों ने कहा, ‘नदी जा रहे थे हम सब स्नान करने। अचानक नजर पड़ गयी और ताला खुला देख कर हम सब तेरे पास आ गए। अब तू भी चल। साथ में नहा-धो लेंगे।’ मैंने जी भर मन ही मन नदी को कोसा, ‘उसका रास्ता इसी कॉलोनी से होकर क्यों गुजरता है।’ गुस्से का क्या है, वह तो किसी पर भी आ जाता है। सो चचेरी बहन पर भी आ गया, ‘क्या जरूरत थी उन्हें इसी कॉलोनी में रहने की? एकाध कॉलोनी आगे-पीछे भी तो रहा जा सकता था।’

       खैर, हैंगर वाले कपड़ों और बेडशीट को सर्फ डले पानी में भिगो कर और रंग पुते दीवारों को उनके हाल पर छोड़ कर मैं भी नदी की ओर चल पड़ा। रंग तो उतरने नहीं थे सो नहीं उतरे। उल्टे भूख चढ़ी जा रही थी। इसलिए सबसे पहले स्नान से फारिग हो लिया। पर दो-तीन बार पहले ही खा-पी कर देश खाने वाले नेताओं की तरह मस्त चल रहे मेरे दोस्तों का स्नान-किलोल राष्ट्र की समस्याओं की तरह खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। मैंने ऊबकर उल्टा-सीधा बकना शुरू किया तो सभी नदी से इस अंदाज में बाहर निकले जैसे मुझ पर बड़ा अहसान कर दिया हो। वापसी में मेरी मरी चाल देख कर मेरे दोस्तों ने मेरा होल बॉडी स्कैन किया। किसी कुशल नाड़ी पकड़ हकीम की तरह मेरा मर्ज दोस्तों ने धर लिया। आखिरकार मेरी भूख के बेतरह चढ़ते ग्राफ को महसूस कर रास्ते में सबसे पहले पड़ने वाले दोस्त के घर पर कारवां रूका। मेरे इमरजेंसी जैसे हालात को समझते हुए मुझे सीधे सुपूर्द-ए-डायनिंग टेबुल किया गया। भाई साहब, क्या बताऊं? उस दिन पहली बार जाना कि भूख जोर मारे तो खाया बिल्कुल नहीं जाता। खाली पड़ी कुर्सी को कब्जाए नेता सरीखा गैस ने मेरे खाली पड़े पेट में कब्जा जमा रखा था। ठूंसठांस के दो-चार निवाले लिए। गला खुश्क पड़ा जा रहा था। पानी से गला तर किया तो पेट में मरोड़ ने अतिक्रमण कर लिया और इसे हटा पाने में प्रशासन की तरह मैं भी विफल साबित हुआ। आखिरकार जूठे हाथ को धोया तो साथ ही साथ खूब जमकर खाने की आस भी धुलती चली गयी। दोस्तों ने खाया-पिया समझ कर लगे हाथों गुलाल खेलने के दूसरे सत्र का उद्घाटन भी मुझसे ही कर डाला। सिलसिला शुरू हुआ तो सभी खुराफातियों ने जमजमा कर आपादमस्तक गुलाल से रंग डाला। रात दस बजे के आसपास किसी एक दोस्त ने फिर से अपने घर ले जाकर खाने को पूछा। पेट की उथल-पुथल के कारण ठीक वैसे ही मैंने खाने की औपचारिकता का निर्वहन किया जैसे किसी मंच के मुख्य अतिथि अपने सामने पड़े नाश्ते की प्लेट के साथ छेड़छाड़नुमा ट्रीट करते हैं। 

      होली के दिन भर के बुरे अनुभव के साथ कमरे में लौटा तो सबसे पहले गुलाल की गुलामी से आजाद होने का उपक्रम किया। यह अंग्रेजों से आजादी पाने से भी मुश्किल साबित हुआ। गुलाल तो धुल गुए लेकिन सिर धोने के क्रम में गाढ़े रंग का एक ऐसा सोता फूट पड़ा जैसे डायरेक्ट हिमालय के ग्लेशियर से पिघल-पिघल कर आ रहा हो। यह रूकने का नाम ही नहीं ले रहा था। वह तो अगले दिन पता चल सका कि दोस्तों के साथ होली के पहले सत्र यानि धुलेन्डी में शामिल नहीं होने की सजा के तौर पर कड़क रंग मिले गुलाल की व्यवस्था उन सबने स्पेशली मेरे लिए कर रखी थी। अंत में खुद को जैसे-तैसे रंगों से मुक्त हुआ मान कर पीछे देखा तो मेरा इंतजार वह कपड़े करते दिखे जो बाल्टी में दोपहर बाद से मुंह फुलाए बैठे थे। बार-बार झुक-झुक कर रंग धोने की सतत प्रक्रिया के कारण मेरी कमर ने तब तक जवाब दे दिया था इसलिए इन कपड़ों पर कल सुबह प्लानिंग करने की सोच बाथरूम से निकल कर सीधे कमरे में खुद को टिकाया। कमरे की पुती पड़ी दीवार ने भविष्यद्रष्टा की तरह अहसास कराया कि वापसी पर बहन दीवार के रंग की तो नहीं पर मेरी रंगत का जरूर झाड़-पोंछ करेंगी। खैर, बेड पर शरीर को पटका तो आराम लगा। आराम मिला तो यकायक एक गीत कानों में बज उठा। शायद होली का प्रभाव ही रहा हो। होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं, गिले-शिकवे भूल के दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं…। गीत याद आया तो इस गीत के गीतकार आनन्द बक्शी साहब भी याद आने लगे। दिन भर के तमाशे के बाद बेहद भयंकर टाइप की चिढ़न दोस्तों से हो गयी थी लेकिन अपने फेवरेट बक्शी साहब की इज्जत का ख्याल भी रखना था। आखिरकार उनकी बात मान ही ली। असल में इसके सिवा मेरे पास चारा ही क्या था। इसलिए सारे गिले-शिकवे वैसे ही भूल गया जैसे चुनाव जीतने के बाद नेता अपने वादे भूल जाते हैं। इधर, नींद ने धक्का-मुक्की शुरू कर दिया था। सो जनता की मांगों की तरफ से आंखें मूंद कर रहने वाले नेताओं की तरह मैंने भी अपनी आंखें मूंद ली। 

         बहरहाल, मेरी छोड़िए। आप अपनी होली पर ध्यान रखिए। आपकी होली मेरी इस होली की तरह कभी न हो। यही चाहत है। शुभकामनाएं। शुभ होली। 

लेखक,

– राजेश मंझवेकर,मंझवे, नवादा (बिहार)

➖Presentation : AnjNewsMedia

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